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Jashpur News – हाथियों से फसल बचाने पेड़ के मचान पर रात गुजार रहें किसान

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Publish Date: | Tue, 13 Oct 2020 05:55 PM (IST)

जशपुरनगर ( MyBagichaप्रतिनिधि)। प्रदेश के घोर हाथी प्रभावित जिले में शामिल जशपुर में इन दिनों अतिकायों का आतंक चरम सीमा पर है। अतिकायों से अपनी खड़ी फसल को बचाने लिए किसान रतजगा करने को मजबूर हैं। भरे बरसात में पेड़ की शाखाओं के बीच,मचान बांधकर,सिर छुपाने के लिए फूस की झोपड़ी बनाकर, किसान पहरेदार करते नजर आ रहें हैं। केंद्र सरकार की एलीफेंट कारिडोर परियोजना में शामिल बादलखोल अभयारण्य और इसके आसपास के इलाके में इस तरह के दृश्य को सहजता से देखा जा सकता है। उल्लेखनीय है कि यह वही क्षेत्र है जहां वर्ष 2019 में ग्रामीण,हाथियों के डर से पक्के मकान को छोड़कर इसके छत में घास की झोपड़ी बना कर सोने के लिए विवश हो गए थे। जानकारी के मुताबिक कुनकुरी वनपरिक्षेत्र के कुडुकेला और जामचुवां पंचायत के जंगलों में इन दिनों 25 से 30 हाथियों ने डेरा जमाया हुआ है। इन उत्पाती हाथियों ने दो दिन पहले ही धान,उड़द और मक्का के खेतों को नुकसान पहुंचाया था। गांव के आसपास हाथियों की उपस्थिति को देखते हुए ग्रामीणों ने अपनी खड़ी फसल को बचाने के लिए खेतों की पहरेदारी करनी शुरू कर दी है। ग्रामीण सुंदरमति पति पूरन ने बताया कि हाथियों ने उसके धान के 10 एकड़ फसल को रौंदा है। अब बचे हुए फसल को बचाने के लिए ग्रामीण एकजुट हो कर रात में पहरेदारी कर रहे हैं। रात के वक्त हाथियों के हमले से बचने के लिए ग्रामीण पेड़ के उपर चढ़कर इन दिनों रतजगा कर रहें हैं। मुंगफली उत्पादक किसान महेश राम ने बताया कि वे बारी बारी से पेड़ की शाखाओं के बीच में फूस और प्लास्टिक की पन्नाी से बने हुए झोपड़ी में रात गुजारते हैं। हाथियों के आते ही टीन,ढोल और मशाल का प्रयोग कर हाथियों के झुंड को खेत से दूर रखने का प्रयास करते हैं। इसमें कुछ हद तक सफलता भी मिल रही है। लेकिन खराब मौसम ग्रामीणों के इस प्रयास में बाधा डाल रही है। रूक रूक कर हो रही बारिश के बीच पेड़ पर वज्रपात होने का खतरा बना रहता है। लेकिन खून पसीने की कमाई को बचाने के लिए यह खतरा उठाना अन्नादाता किसान की मजबूरी है।

हाथियों के उत्पात से हुई है भारी जनहानि

झारखंड और ओडिसा की सीमा पर स्थित जशपुर जिले में हाथियों की समस्या साल दर साल गंभीर होती जा रही है। इसका अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि हाथियों ने साल 2020 में जनवरी से लेकर अब तक जिले में 27 लोगों की जान ले चुके हैं। नारायणपुर के आसपास ही साल भर के अंदर कम से कम दो लोगों की मौतें हाथियों के हमले में हो चुकी है। मार्च माह में लॉकडाउन के ठीक पहले इस क्षेत्र में जहर से एक गर्भवती हथिनी की भी संदिग्ध अवस्था में मौत हुई थी। इस घटना के बाद हाथी और मानव द्वंद्व पर नकेल कसने के लिए प्रदेश के वनविभाग के आला अफसरों ने वनमंडल कार्यालय में आयोजित कार्यशाला में जिले के वन विभाग के कर्मचारियों की सजगता को जांचने के साथ आवश्यक दिशा निर्देश भी दिए थे। लेकिन मार्च माह के अंतिम सप्ताह में कोरोना संक्रमण की वजह से केंद्र सरकार द्वारा लाकडाउन घोषित कर दिए जाने की वजह से कार्यशाला में तैयार रणनीति अब तक जमीन में नहीं उतर पाया है।

यहां पक्के मकान के छत पर बन गई थी झोपड़ी

कुनकुरी वनपरिक्षेत्र और बादलखोल अभयारण्य क्षेत्र में वर्ष 2019 में अतिकायों की दहशत इस चरमसीमा पर था। यहां हाथी के दल रात के वक्त घर की दीवार और दरवाजा तोड़ कर ग्रामीणों पर हमला कर रहे थे। जान बचाने के लिए कुछ ग्रामीणों ने पक्के मकान के छत के उपर प्लास्टिक की पन्नाी डाल कर रात गुजारना शुरू कर दिया था। वहीं तपकरा वनपरिक्षेत्र में ग्रामीणों को सुरक्षित रखने के लिए वनविभाग ने कच्चे मकानों में रहने वाले ग्रामीणों को सरकारी स्कूल व छात्रावास भवनों में रात गुजारने की व्यवस्था की थी।

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Posted By: MyBagichaNews Network

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