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News – छत्तीसगढ़ के जनकवि

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छत्तीसगढ़ राज के जनभाखा छत्तीसगढ़ी मं साहित्य रचना के परमान तो कवि हरि ठाकुर के अनुसार हजार बछर पहिली ले मिलथे। फेर, बीसवीं सताब्दी मं एकर रचनाकारमन एकउहा उभर के आगू आथें। मजा के बात ये हे साहित्य के जम्मों कालमन जइसे वीरगाथाकाल, भक्तिकाल, रीतिकाल अउ आधुनिककाल एक्केकाल मं रटपिटा के उमड़थे। आजो घलो अइसने हाल हे। बीसवीं सदी के सत्तरवां दसक ह साहित्य रचने के दृस्टि से अलग चिन्हउ परथे। जनकवि, मैं ओमन ला कहिथों, जेन जनभाखा मं, जनजीवन ला जी के, जन बर लिखथें। उंकर लिखई ह अलग ले चिन्हउ होथे।
छत्तीसगढ़ी मं अब्बड़झन जनकवि होय हें, जिंकर पहचान उंकर लिखई आय। मैं भागमानी अंव कि जेन बखत लिखे बर सुरू करेंव, ठउका उही बखत छत्तीसगढ़ी ह अपन लोकप्रियता के इतिहास रचे बर मंच, रंगमंच अउ ग्रामोफोन रिकार्ड के रूप मं संचरे लगिस ते पाय के छत्तीसगढ़ी भाखा के आज तक के मैं संउहे गवाही बनेंव। कविता के मंच मं पचपन साल गुजारे के कारन मोला सुरता हे कि कोन-कोन कविमन अपन जमाना मं छत्तीसगढ़ी ला स्थापित करे बर कइसे-कइसे उदिम करिंन। मोर सुरता मं छत्तीसगढ़ी के जनकविमन मं पहिली बिराजे हे सपोस (खरसिया) के कवि मनोहर दास ‘नृसिंहÓ। जेकर एक लाइन ह आजो घलो मोर दिमाग मं बइठे हे कि ‘दुनिया के बनइया भइया पथरा के होही।Ó तेकर बाद रायगढ़ के कवि लाल फूलचंद श्रीवास्तव (आगे असाढ़ गिरगे पानी) के सुरता आथे। वो जमाना मं ‘राम केंवट संबादÓ, (दशरथ लाल निषाद) ‘सीटू अउ गुरबारीÓ, ‘खुसरा चिरई के बिहावÓ (शुकलाल प्रसाद पांडेय), जइसे चरपतिया किताब हाट-बजार मं अड़बड़ बेंचावय, जेला उन कविमन गा-गा के बेंचय।
राजिम मेला मं पंडित सुन्दरलाल शर्मा के ‘दान लीलाÓ के एक घंटा मं एक हजार किताब बेंचाय रहिस। करगीरोड कोटा के कवि रंजनलाल पाठक के भाखा ह जनकवि के रहिस। फेर, ओमा साहित्य घलो रहिस। अंग्रेजमन के टोप ला ‘सैकमी कस टोपÓ उन कहे रहिंन। ‘ये ह नोहय कछेरी, साहेब बाबू बइठे-बइठे खेलथें गरीÓ, जइसे अमर पंक्ति कोनो भुला नइ सकय। भाखा के हिसाब से पं. द्वारिका प्रसाद तिवारी, बाबूलाल सीरिया, अखेचंद क्लांत, श्यामलाल चतुर्वेदी, नारायणलाल परमार, लाला जगदलपुरी, राजेंद्र तिवारी जनकवि रहिंन। फेर, साहित्य अउ सोच के हिसाब से उन बड़का कवि कहलाइंन।
छत्तीसगढ़ी कविता ला मंच मं स्थापित करइयामन मं मनोरंजन मिश्र, पंडित दानेश्वर शर्मा, डॉ. विमल कुमार पाठक, विद्याभूषण मिश्र, रघुवीर अग्रवाल पथिक, हेमनाथ यदु, पवन दीवान, मुस्तफा हुसैन मुश्फिकमन के जबड़ हाथ हे। कोदूराम ‘दलितÓ, बद्री विशाल परमानंद, हेमनाथ वर्मा ‘विकलÓ, मेहत्तर राम साहू, भगवती सेन, गेंदराम ‘सागरÓ, गणेश सोनी प्रतीक, पाठक परदेशी जइसे कविमन भाखा के महात्तम बढ़ाय बर बिक्कट मिहनत करिंन।
अस्सी के दसक मं फिल्मी गाना के टक्कर मं गीत लिख के जन-जन मं लोकप्रिय बनाय के श्रेय डॉ. नरेंद्र देव वर्मा, रविशंकर शुक्ल, लक्ष्मण मस्तुरिया, रामेश्वर वैष्णव, मुकुंद कौशल, जीवन यदु राहीं, दीप दुर्गवी, मुरली चंद्राकर, रामेश्वर शर्मा, मदन जाटव, सुशील यदु, देवधर महंत के खाता मं जाथे। जनकवि के सही रूप हमन उधोराम झखमार के कविता मं मिलथे। भाखा, रंग, रूप अउ कविता पढ़े के तौर-तरीका मं उन पूरा जनकवि रहिंन। रामरतन सारथी, विश्वम्भर यादव ‘मरहाÓ घलो उहीच गतर के रहिन।
जनकवि कहलाय के लाइक तो येहूमन घलो हें- दशरथलाल निषाद, नोहर लाल ‘अधमरहाÓ, बेनूराम सेन, मोहन चतुर्वेदी, चैतराम ब्यास, गजपति साहू, पीसी लाल यादव, बुधराम यादव, बंधु राजेश्वर खरे, रंजन सार्वा, ‘सुखीराम दुखीÓ, डॉ. रमाकांत सोनी, केदार परिहार, केदार दुबे, कृष्णा भारती, गौरव रेणु ‘नाविकÓ, आत्माराम कोसा, माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंगÓ, तीरथराम गढ़ेवाल, डॉ. संध्यारानी शुक्ला, सुमन शर्मा बाजपेयी। अउ, नेवरिया कवि जेन हाल-हाल मं साहित्य मं खुसरिन हें अउ जेनमन मं अपार संभावना दिखत हे उन हें- किशोर तिवारी, रमेश विश्वहार, आलोक शर्मा, बलराम चंद्राकर, भैया नागवंशी, पुरषोत्तम चक्रधारी, संतोष ब्यास, रामेश्वर ठाकुर, ‘बिंदासÓ, आदित्य शुक्ला, उमाकांत टैगोर, सुरेश पैगवार, अशोक आकाश, पुष्कर राज, कौशल साहू ‘लक्ष्यÓ, भवानी शंकर ‘बेगानाÓ, मिलन मलरिहा, रामानंद त्रिपाठी, बंशीधर मिश्र, शशिभूषण स्नेही, चोवाराम बादल, डुमनलाल ध्रुव, हीरामणि वैष्णव, लक्ष्मीनारायण ‘फरारÓ, इन्द्रजीत दादर, ओमप्रकाश औसर, ऋषि कुमार वर्मा ‘बइगाÓ, राजेश तिवारी, सफल भोई, सतीश शर्मा, संजय कबीर शर्मा, साक्षी गोपाल पंडा, तिलक लांगे, डॉ. संतराम देशमुख, मणिराम मितान, रामानंद त्रिपाठी, गोकुल चंदन, इंद्रजीत दादर, रामदेव शर्मा, लखन साहू ‘लहरÓ,जइसे अड़बड़झन कवि हें, जेन छत्तीसगढ़ी बाना बांधे बर तंग तियार बइठे हें। उम्मीद हे कि छत्तीसगढ़ी भाखा के लोकप्रियता, गौरव, साहित्य अउ संदेश ह एक दिन अकास ला छूही।



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