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News – मनखे के ख्याल अउ सरग के असलियत

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मितान! ख्याल यानी कल्पना नइ होही त का होही? कोनो मनखे सोचबेच नइ करहीं त…। अइसन हो जही त मनखे ह चार दिन के जिनगी म दू दिन नइ गुजार सकय। वोहा जानवर कस हो जही। अजी ये ख्याल, कल्पना, सोचेच ह तो हे, जउन भिखमंगामन ल राज-पाठ के, बुढ़वामन ल जवानी के, मूरखमन ल बुद्धिमानी के अउ हारत ल जीत के सपना देखाथे। जइसे हमर देस-राजमन म नवा सरकार बनथे, त लोगनमन किसम-किसम के सपना देखे बर धर लेथें।
सिरतोन! गरीबी मिटा जही, बेरोजगारी नइ रइही, महंगाई छूमंतर हो जही, भरस्टाचार खत्म हो जही, गांवमन चमचमात सहर कस अउ सहरमन ‘सिंगापुरÓ कस बन जही, अइसे सपना देखथें, सोचथें। फेर, जब ये सच नइ होवय त फेर कोसे बर धर लेथें। कभु अपन किसमत ल, त कभु सरकार चलइयामन ल।
मितान! दुनिया जानत हे कभु सिकंदर, कभु नेपोलियन, कभु हिटलर त कभु आज के नेतामन जनता ल अपन लफ्फाजी भरे वादा-दावा, भासन से सम्मोहित करे हें। सिकंदर, नेपोलियन अउ हिटलर ह तो इतिहास के भूत होगे, फेर आज जउनमन हावंय वोमन बाकायदा आम जनता के भाग्यबिधाता बने बइठे हावंय। वोमन तो ये धरती ल सरग बनाय के सपना दिखाथें। काबर के मनखे के दिमाग म सरग जइसे सुख के ख्याल भराय हे। सुग्घर परी, पीये बर सोमरस अउ खाय बर आनी-बानी के जिनिस। इही ख्याल करत-करत मनखे जिनगी बीता देथे। धरती के सुख ल तो बने नइ भोग सकय, अउ सरग सिधार जथे। अब सरग के सुख ल तो सरगेच जवइयामन जानहीं। इहां ले खाली ख्याल कर सकत हंन। तभो ते कहे गे हे – ‘मरे बिना सरग नइ मिलय।Ó
सिरतोन! मनखे के दिमाग म सरग के सुख पाय के इच्छा ह अइसे खुसर गे हे के वोहा अंधबिसवास म पर जथे। दूसर जउन बताही, देखाही, समझाही, सुनाही उहीच ल सच मान बइठथे। अपन कोती ले बिचार करबेच नइ करय। वोला तो बस सरग के सुख दिखई देथे। भगवान के मूरति भले पथरा के होथे। फेर, जेन जइसे सरद्धा-भगती से पूजा-पाठ करथे, भगवान ल सुमिरन करथे, धरम अउ सच के रद्दा म रेंगथे त ‘फलÓ घलो वोकरे मुताबिक मिलथे। गीता म लिखाय हे- मनखे जइसे करम करही, वोला वोइसनेच फल मिलही।
मितान! हिंदी फिलिम संन्यासी म घलो एकठिन गाना हे – ‘जैसे करम करेगा वैसे फल देगा भगवान, यह है गीता का ज्ञान, यह है गीता का ज्ञान, यह है गीता का ज्ञान, यह है गीता का ज्ञान।Ó
सिरतोन! मनखे के सबो करम के हिसाब इहें भुइंया लोक म होथे। मनखे ल पता नइ चलय के वोकर कोन से करम के फल वोला कोन रूप म मिलत हे। कोनो ल पता चल जथे त वोहा मानबेच नइ करय। जइसे- कोनो मनखे ह ककरो बर गुस्सा करिस। वोकर अपमान कर दिस। त जरूरी नइये के वोकर फल उहीच मनखे से मिलही। अपमान करइया के अपमान दूसर जगा, दूसर मनखे ह, दूसर रूप म कर सकत हे। इही ल तो कहिथे- भगवान के लाठी म अवाज नइ होवय। तभो ले मनखेमन मानबेच नइ करंय, त अउ का -कहिबे।



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