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News – 6 प्रतिशत लोग ही नियमित पहन रहे मास्क, न पहनने वाले बोले- गुटखा थूकने और ध्रूमपान में दिक्कत

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– पं. जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज और एनजीओ की रिपोर्ट से खुलासा .
– रायपुर में 36,500 संक्रमित,468 मौतों के बाद भी नहीं सोए हुए हैं लोग .
– सर्वाधिक 32 प्रतिशत लोगों ने कहा- मास्क खरीदने को हमारे पास पैसे नहीं .

रायपुर. प्रदेश की राजधानी रायपुर में कोरोना संक्रमण से अब तक 36,500 लोग संक्रमित हो चुके हैं। 468 मौतें हो चुकी है। यह महामारी मौत का तांडव कर रही है, इसके बावजूद लापरवाही पर लापरवाही बरती जा रही है। पं. जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज के कम्युनिटी मेडिसीन विभाग और समर्थन सेंटर फॉर डेवेलपमेंट सपोर्ट की एक सर्वे रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि शहर में सिर्फ 6 प्रतिशत लोग ही नियमित मास्क पहनते हैं, या पहनना पसंद करते हैं। बाकी ९४ प्रतिशत लोगों के अपने अजीबो-गरीब तर्क हैं। सोचिए, जब कोई व्यक्ति कहता है कि वह मास्क इसलिए नहीं पहनता क्योंकि उसे गुटखा थूकने, धूम्रपान करने में परेशानी होती है। अब इससे बड़ी लापरवाही या कहें कि जानते-समझते हुए गैरजिम्मेदारी क्या होगी?

पत्रिका के पास मौजूद यह रिपोर्ट शहर के अलग-अलग क्षेत्रों के 1075 व्यक्तियों के बीच जाकर तैयार की गई है। अभी ग्रामीण क्षेत्रों में भी सर्वे शुरू होने वाला है। ये रिपोर्ट स्टेट कोरोना एंड कमांड सेंटर की कोर कमेटी के समक्ष रखी जाएगी। इसके आधार पर आगे की रणनीति तैयार होगी। ‘पत्रिका’ ने इसके पहले रायपुर नगर निगम की रिपोर्ट से खुलासा किया था कि 52 हजार लोगों ने मास्क, सोशल डिस्टेंसिंग, थूकने और लॉकडाउन में नियमों का पालन न करने वाले दुकानदारों ने 47 लाख का जुर्माना भरा। अगर, हम ऐसी ही लापरवाही करते रहे तो विशेषज्ञों का कहना है कि कोरोना कभी भी पलटवार कर सकता है।

लोगों के मास्क न पहनने के पीछे के तर्क सुनिए, कहीं आप भी ऐसा नहीं करते-
३२.६ प्रतिशत- पैसों की कमी

१८.७ प्रतिशत- कोई लक्षण नहीं
१६ प्रतिशत- सांस लेने में परेशानी

५.२ प्रतिशत- गुटखा थूकने में दिक्कत
४.७ प्रतिशत- बात करने में दिक्कत

४.७ प्रतिशत- चश्मा पहनने में परेशानी
४.३ प्रतिशत- भूल जाना

३.० प्रतिशत- स्मोकिंग में दिक्कत
२.१ प्रतिशत- हम पॉजिटिव नहीं है

१.८ प्रतिशत- मास्क से बचाव संभव नहीं
०.८ प्रतिशत- नाक में खुजली होना

मास्क का उपयोग कैसे बढ़े, इसके सुझाव-
मुफ्त मास्क वितरण: व्यक्ति प्रयास कर रहे हैं कि मास्क पहनने उनके पास गुणवत्तायुक्त मास्क नहीं होता। पाबंधियों के कारण मास्क पहनते हैं, मगर उसकी गुणवत्ता खराब होती है। इससे उनका दम घुटता है। वे गमछे, टॉवेल का इस्तेमाल करते हैं। इसलिए जरुरतमंदों को मास्क दिए जाएं।

रोक-टोक: रोक-टोक दल का गठन कर इस आदत को बिना कार्रवाई के दैनिक जीवन में शामिल करवाया जा सकता है। कुछ क्षेत्रों में ऐसे सफल प्रयास हुए हैं।
पंचायत प्रतिनिधियों को प्रशिक्षण: यह स्पष्ट है कि कोरोना वायरस गांवों तक पहुंच चुका है। मास्क के प्रति पंचायत प्रतिनिधियों को संवेदनशील करना आवश्यक है। पंचायत स्तर पर जागरूक कैडर्स बनाए जा सकते हैं।

मास्क के बिना प्रवेश निषेध: पेट्रोल पंप, किराना दुकान, सब्जी दुकान, सार्वजनिक स्थलों, होटल-रेस्त्रां में प्रवेश प्रतिबंधित हो। यहां तक की गांवों में हैंडपंप में पानी तक न मिले।

मोबाइल स्क्रीन डिस्प्ले: निजी कंपनियां अपने कर्मचारियों की भूलने वाली आदतों को उनके मोबाइल स्क्रीन पर फॉवर्ड करती हैं। व्यक्ति मास्क पहनना भूल सकता है, मगर मोबाइल नहीं। मास्क से संबंधित जानकारी मोबाइल पर डिस्प्ले होने से आदत में सुधार आ सकता है।

‘ पत्रिका’ का अभियान भी हिस्सा
‘पत्रिका’ ने हफ्तेभर पहले ‘मास्क है तो टेंशन नहीं’ अभियान की शुरुआत की। जिसमें विशेषज्ञों के जरिए मास्क का महत्व समझाया जा रहा है। वे अपने अनुभव भी साझा कर रहे हैं। रिपोर्ट में इसी नाम से अभियान चलाने का सुझाव दिया गया है। जो सोशल मीडिया, ई-संचार और अन्य तकनीक के माध्यम से आयोजित किया जा सकता है। इसमें सेल्फी विथ मास्क फेसबुक, बेबीनार, लाउड स्पीकर से घोषणाएं, मास्क नहीं पहनने वालों की फोटो सार्वजनिक करने जैसे सुझाव दिए हैं। अन्य संगठनों को भी इसका हिस्सा बनाने की बता कही गई है।

आज की स्थिति में मास्क ही बचाव है। मास्क की उपयोगिता को लेकर सर्वे में जो तथ्य सामने आए हैं, उससे स्पष्ट है कि मास्क के प्रति लोगों को जागरूक करना बेहद जरूरी है।
डॉ. कमलेश जैन, सदस्य फीडबैक वर्टिकल, कोरोना कंट्रोल एंड कमांड सेंटर एवं प्रोफेसर मेडिकल कॉलेज रायपुर









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