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Munshi Premchand

त्रिशूल – मुंशी प्रेमचंद की कहानी (Trishul – Munsi Premchand ki Kahani)

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अंधेरी रात है, मूसलाधार पानी बरस रहा है। खिड़कियों पर पानीके थप्पड़ लग रहे हैं। कमरे की रोशनी खिड़की से बाहर जाती है तो पानी की बड़ी-बड़ी बूंदें तीरों की तरह नोकदार, लम्बी, मोटी, गिरती हुई नजर आ जाती हैं। इस वक्त अगर घर में आग भी लग जाय तो शायद मैं बाहर निकलने की हिम्मत न करूं। लेकिन एक दिन जब ऐसी ही अंधेरी भयानक रात के वक्त मैं मैदान में बन्दूक लिये पहरा दे रहा था। उसे आज तीस साल गुजर गये। उन दिनों मैं फौज में नौकर था। आह! वह फौजी जिन्दगी कितने मजे से गुजरती थी। मेरी जिन्दगी की सबसे मीठी, सबसे सुहानी यादगारें उसी जमाने से जुड़ी हुई हैं।

आज मुझे इस अंधेरी कोठरी में अखबारों के लिए लेख लिखते देखकर कौन समझेगा कि इस नीमजान, झुकी हुई कमरवाले खस्ताहाल आदमी में भी कभी हौसला और हिम्मत और जोश का दरिया लहरे मारता था। क्या-क्या दोस्त थे जिनके चेहरों पर हमेशा मुसकराहट नाचती रहती थी। शेरदिल रामसिंह और मीठे गलेवाले देवीदास की याद क्या कभी दिल से मिट सकती है? वह अदन, वह बसरा, वह मिस्त्र; बस आज मेरे लिए सपने हैं। यथार्थ है तो यह तंग कमरा और अखबार का दफ्तर।

हां, ऐसी ही अंधेरी डरावनी सुनसान रात थी। मैं बारक के सामने बरसाती पहने हुए खड़ा मैग्जीन का पहरा दे रहा था। कंधे पर भरा हुआ राइफल था। बारक के से दो-चार सिपाहियों के गाने की आवाजें आ रही थीं, रह-रहकर जब बिजली चमक जाती थी तो सामने के ऊंचे पहाड और दरख्त और नीचे का हराभरा मैदान इस तरह नजर आ जातेथे जैसे किसी बच्चे की बड़ी-बड़ी काली भोली पुतलियों में खुशी की झलक नजर आ जाती है।धीरे-धीरे बारिश ने तुफानी सूरत अख्तियार की। अंधकार और भी अंधेरा, बादल की गरज और भी डरावनी और बिजली की चमक और भी तेज हो गयी। मालूम होता था प्रकृति अपनी सारी शक्ति से जमीन को तबाह कर देगी।

यकायक मुझे ऐसा मालूम हुआ कि मेरे सामने से किसी चीज की परछाई-सी निकल गयी। पहले तो मुझे खयाल हुआ कि कोई जंगली जानवर होगा लेकिन बिजली की एक चमक ने यह खयाल दूर कर दिया। वह कोई आदमी था, जो बदन को चुराये पानी में भिगता हुआ एक तरफ जा रहा था। मुझे हैरत हुई कि इस मूलसाधार वर्षा में कौन आदमी बारक से निकल सकता है और क्यों? मुझे अब उसके आदमी होने में कोई सन्देह न था। मैंने बन्दूक सम्हाल ली और फोजी कायदे के मुताबिक पुकारा—हाल्ट, हू कम्स देअर? फिर भी कोई जवाब नहीं। कायदे के मुताबिक तीसरी बार ललकारने पर अगर जवाब न मिले तो मुझे बन्दूक दाग देनी चाहिए थी। इसलिए मैंने बन्दूक हाथ में लेर खूब जोर से कड़ककर कहा—हाल्ट, हू कम्स देअर? जवाब तो अबकी भी न मिला मगर वह परछाई मेरे सामने आकर खड़ी हो गई। अब मुझे मालूम हुआ कि वह मर्द नहीं औरत है। इसके पहले कि मैं कोई सवाल करूं उसने कहा—सन्तरी, खुदा के लिए चुप रहो। मैं हूं लुईसा।


मेरी हैरत की कोई हद न रही। अब मैंने उस पहचान लिया। वह हमारे कमाण्डिंग अफसर की बेटी लुईसा ही थी। मगर इस वक्त इस मूसलाधार मेह और इस घटाटोप अंधेरे में वह कहां जा रही है? बारक में एक हजार जवान मौजूद थे जो उसका हुक्म पूरा कर सकते थे। फिर वह नाजुकबदन औरत इस वक्त क्यों निकली और कहां के लिए निकली? मैंने आदेश के स्वर में पूछा—तुम इस वक्त कहां जा रही हो? लुईसा ने विनती के स्वर में कहा—माफ करो सन्तरी, यह मैं नहीं बता सकती और तुमसे प्रार्थना करती हूं यह बात किसी से न कहना। मैं हमेशा तुम्हारी एहसानमन्द रहूंगी।

यह कहते-कहते उसकी आवाज इस तरह कांपने लगी जैसे किसी पानी से भरे हुए बर्तन की आवाज। मैंने उसी सिपाहियाना अन्दाज में कहा—यह कैसे हो सकता है। मैं फौज का एक अदना सिपाही हूं। मुझे इतना अख्तियार नहीं। मैं कायदे के मुताबिक आपको अपने सार्जेन्ट के सामने ले जाने के लिए मजबूर हूं। ‘लेकिन क्या तुम नहीं जानते कि मैं तुम्ळारे कमाण्डिंग अफसर की लड़की हूं? मैंने जरा हंसकर जवाब दिया—अगर मैं इस वक्त कमाण्डिंग अफसर साहब को भी ऐसी हालम में देखूं तो उनके साथ भी मुझे यही सख्ती करनी पड़ती। कायदा सबके लिए एक-सा है और एक सिपाही को किसी हालत में उसे तोड़ने का अख्तियार नही है। यह निर्दय उत्तर पाकर उसने करुणा स्वर में पूछा—तो फिर क्या तदबीर है?

मुझे उस पर रहम तो आ रहा था लेकिन कायदों की जंजीरों में जकड़ा हुआ था। मुझे नतीजे का जरा भी डर न था। कोर्टमार्शल या तनज्जुली या और कोई सजा मेरे ध्यान में न थी। मेरा अन्त:करण भी साफ था। लेकिन कायदे को कैसे तोडूं। इसी हैस-बैस में खड़ा था कि लुईसाने एक कदम बढ़कर मेरा हाथ पकड़ लिया और निहायत पुरदर्द बेचैनी के लहाजे में बोली—तो फिर मैं क्या करूं?

ऐसा महसूस हो रहा था कि जैसे उसका दिल पिघला जा रहा हो। मैं महसूस कर रहा था कि उसका हाथ कांप रहा था। एक बार जी में आया जाने दूं। प्रेमी के संदेश या अपने वचन की रक्षा के सिवा और कौन-सी शक्ति इस हालत में उसे घर से निकलने पर मजबूर करती? फिर मैं क्यों किसी की मुहब्बत की राह का काटा बनूं। लेकिन कायदे ने फिर जबान पकड़ ली। मैंने अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश न करके मुंह फेरकर कहा—और कोई तदबीर नहीं है।

मेरा जवाब सुनकर उसकी पकड़ ढीली पड़ गई कि जैसे शरीर में जान न हो पर उसने अपना हाथ हटाया नहीं, मेरे हाथ को पकड़े हुए गिड़गिड़ा कर बोली—संतरी, मुझ पर रहम करो। खुदा के लिए मुझ पर रहम करों मेरी इज्जत खाक में मत मिलाओ। मैं बड़ी बदनसीब हूं। मेरे हाथ पर आंसूओं के कई गरम कतरे टपक पड़े। मूसलाधार बारिश का मुझ पर जर्रा-भर भी असर न हुआ था लेकिन इन चन्द बूंदों ने मुझे सर से पांव तक हिला दिया।

मैं बड़े पसोपेश में पड़ गया। एक तरफ कायदे और कर्ज की आहनी दीवार थी, दूसरी तरफ एक सुकुमार युवती की विनती-भरा आग्रह। मैं जानता था अगर उसे सार्जेण्ट के सिपुर्द कर दूंगा तो सवेरा होते ही सारे बटालिन में खबर फैल जाएगी, कोर्टमार्शल होगा, कमाण्डिंग अफसर की लड़की पर भी फौज का लौह कानून कोई रियायत न कर सकेगा। उसके बेरहम हाथ उस पर भी बेदर्दी से उठेंगे। खासकर लड़ाई के जमाने में। और अगर इसे छोड़ दूं तो इतनी ही बेदर्दी से कानूने मेरे साथ पेश आयेगा। जिन्दगी खाक में मिल जायेगी। कौन जाने कल जिन्दा भी रहूं या नहीं। कम से कम तनज्जुली तो होगी ही। भेद छिपा भी रहे तो क्या मेरी अन्तरात्मा मुझे सदा न धिक्कारेगी? क्या मैं फिर किसी के सामने इसी दिलेर ढंग से ताक सकूंगा? क्या मेरे दिल में हमेशा एक चोर-सा न समाया रहेगा? लुईसा बोल उठी—सन्ती!

विनती का एक शब्द भी उसके मुंह से न निकला। वह अब निराशा की उस सीमा पर पहुंच चुकी थी जब आदमी की वाक्शक्ति अकेले शब्दों तक सीमित हो जाती है। मैंने सहानुभूति के स्वर मे कहा—बड़ी मुश्किल मामला है। ‘सन्तरी, मेरी इज्जत बचा लो। मेरे सामर्थ्य में जो कुछ है वह तुम्हारे लिए करने को तैयार हूं।’ मैंने स्वाभिमानपूर्वक कहा—मिस लुईसा, मुझे लालच न दीजिए, मैं लालची नहीं हूं। मैं सिर्पु इसलिए मजबूर हूं कि फौजी कानून को तोड़ना एक सिपाही के लिए दुनिया में सबसे बड़ा जुर्म है। ‘क्या एक लड़की के सम्मान की रक्षा करना नैतिक कानून नहीं है? क्या फौजी कानून नैतिक कानून से भी बड़ा है?’ लुईसाने जरा जोश में भरकर कहा।

इस सवाल का मेरे पास क्या जवाब था। मुझसे कोई जवाब न बन पड़ा। फौजी कानून अस्थाई, परिवर्तनशील होता है, परिवेश के अधीन होता है। नैतिक कानून अटल और सनातन होता है, परिवेश से ऊपर। मैंने कायल होकर कहा—जाओ मिस लुईसा, तुम अब आजाद हो, तुमने मुझे लाजवाब कर दिया। मैं फौजी कानून तोड़कर इस नैतिक कर्त्तव्य को पूरा करूंगा। मगर तुमसे केवल वही प्रार्थना है कि आगे फिर कभी किसी सिपही को नैतिक कर्त्तव्य का उपदेश न देना क्योंकि फौजी कानून फौजी कानून है। फौज किसी नैतिक, आत्मिक या ईश्वरीय कानून की परवाह नहीं करता।

लुईसा ने फिर मेरा हाथ पकड़ लिया और एहसान में डूबे हुए लहजे में बोली—सन्तरी, भगवान् तुम्हें इसका फल दे। मगर फौरन उसे संदेह हुआ कि शायद यह सिपाही आइन्दा किसी मौके पर यह भेद न खोल दे इसलिए अपने और भी इत्मीनान के खयाल से उसने कहा—मेरी आबरू अब तुम्हारे हाथ है। मैंने विश्वास दिलाने वाले ढंग से कहा—मेरी ओर से आप बिल्कुल इत्मीनान रखिए। ‘कभी किसी से नहीं कहोगे न?’ ‘कभी नहीं।’ ‘कभी नहीं?’ ‘हां, जीते जी कभी नहीं।’

‘अब मुझे इत्मीनान हो गया, सन्तरी। लुईसा तुम्हारी इस नेकी और एहसान को मौत की गोद में जाते वक्त भी न भूलेगी। तुम जहां रहोगे तुम्हारी यह बहन तुम्हरे लिए भगवान से प्रार्थना करती रहेगी। जिस वक्त तुम्हें कभी जरुरत हो, मेरी याद करना। लुईसा दूनिया के उस पर्द पर होगी तब भी तुम्हारी खिदमत के लिए हाजिर होगी। वह आज से तुम्हें अपना भाई समझती है। सिपाही की जिन्गी में ऐसे मौके आते हैं, जब उसे एक खिदमत करने वाली बहन की जरुरत होती है। भगवान न करे तुम्हारी जिन्दगी में ऐसा मौका आयें लेकिन अगर आयें तो लुईसा अना फर्ज अदा करने में कभी पीछे न रहेगी। क्या मैं अपने नेकमिजाज भाई का नाम पूछ सकती हूं?’

बिजली एक बार चमक उठी। मैंने देखा लुईसा की आंखों में आंसू भरे हुए हैं। बोला-लुईसाख् इन हौसला बढ़ाने वाली बातों के लिए मैं तुम्हारा ह्रदय से कृतज्ञ हूं। लेकिन मैं जो कुछ कर रहर हूं, वह नैतिकता औरहमदर्दी के नाते कर रहा हूं। किसी इनाम की मुझे इच्छा नहीं है। मेरा नाम पूछकर क्या करेगी? लुईसा ने शिकायत के स्वर में कहा-क्या बहन के लिए भाई का नाम पूछना भी फौजी कानून के खिलाफ है? इन शब्द में कुछ ऐसी सच्चाई, कुछ ऐस प्रेम, कुछ ऐसा अपनापन भरा हुआ था, कि मेरी आंखों मे बरबस ऑंसू भर आये।

बोला—नहीं लुईसा, मैं तो सिर्फ यही चाहता हूं कि इस भाई जैसे सलूक में स्वार्थ की छाया भी न रहने पाये। मेरा नाम श्रीनाथ सिंह है। लुईसा ने कृतज्ञता व्यक्त करने के तौर पर मेरा हाथ धीरे से दबाया और थैक्स कहकर चली गई। अंधेरे के कारण बिल्कुल नजर न आया कि वह कहां गई और न पूछना ही उचित था। मैं वहीं खड़ा-खड़ा इस अचानक मुलाकात के पहलुओं को सोचता रहा। कमाण्डिंग अफसर की बेटी क्या एक मामूली सिपाही को और वह भी जो काल आदमी हो, कुत्ते से बदत्तर नहीं समझती? मगर वही औरत आज मेरे साथ भाई का रिश्ता कायम करके फूली नहीं समाती थी।

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